Published On: Sat, Aug 29th, 2020

जो कुछ कर दिखाने का जज्बा रखते हैं, उनके लिए हालात मायने नहीं रखते


(Bihar News ) कुछ कर दिखाने का जज्बा रखने वालों के लिए हर विपरीत परिस्थिती एक चुनौती के साथ खुद को साबित करने का अवसर भी होती है। कोरोना काल (Corona period ) में जहां मंदी का दौर है, निजी क्षेत्र में रोजगार और आय का संकट है, ऐसे हालात को भी एक निजी स्कूल संचालक ने (Mushroom crop in school) अवसर में बदल दिया। स्कूल में मशरुम की पैदावार।

जमुई(बिहार): (Bihar News ) कुछ कर दिखाने का जज्बा रखने वालों के लिए हर विपरीत परिस्थिती एक चुनौती के साथ खुद को साबित करने का अवसर भी होती है। कोरोना काल (Corona period ) में जहां मंदी का दौर है, निजी क्षेत्र में रोजगार और आय का संकट है, ऐसे हालात को भी एक निजी स्कूल संचालक ने (Mushroom crop in school) अवसर में बदल दिया। स्कूल बंद होने के कारण के कारण स्कूल के कमरों में मशरूम (Income from mushroom) का उत्पादन कर अच्छी-खासी कमाई की जा रही है। इस सबके पीछे है नई सोच और कुछ कर गुजरने की हिम्मत।

स्कूल में मशरुम की पैदावार
स्कूल को मशरूम उत्पादन केंद्र में बदलने का यह कमाल किया है जमुई के मणिदीप अकादमी के संचालकों ने। शहर के प्रतिष्ठित निजी विद्यालयों में शुमार इस स्कूल में मशरुम के जरिए कमाई के साथ ही रोजगार के नए आयाम खुल गए हैं। मशरूम उत्पादन कैसे करें इसके लिए इस स्कूल संचालक ने पहले सोशल मीडिया पर उसे जुड़ा वीडियो देखा और फिर मशरूम उत्पादन करने वाले किसानों से संपर्क किया फिर कृषि वैज्ञानिकों से ऑनलाइन ट्रेनिंग लेकर दूसरी जगहों से बीज मंगवाई और मशरूम का उत्पादन शुरू कर दिया।

बंद स्कूल का बेहतर उपयोग
स्कूल के निदेशक अभिषेक कुमार की मानें तो कोरोना के कारण लॉकडाउन में जब स्कूल बंद हो गया, स्कूल संचालन के लिए, स्कूल स्टाफ को वेतन देने के लिये जब पैसे की कमी होने लगी तो स्कूल के कमरों का उपयोग करना बेहतर सोचा क्योंकि उसके स्कूल के अधिकांश क्लास रूम एयर कंडीशन है फिर मशरूम के लिए उपयुक्त मांनते हुए उसमें इसका फसल लगाना शुरू किया।

वर्चुअल ट्रेनिंग से शुरुआत की
वर्चुअल ट्रेनिंग लेकर बाहर से बीज मंगा कर मशरूम उत्पादन के लिए पैकेट का निर्माण यहीं खुद होता है। यहां के मशरूम की मांग बाजार में भी खूब हो रही है। मांग के अनुसार को देखते हुए उत्पादन का दायरा और बढ़ाया जा रहा है। कोरोना के बाद जो भी यह स्वरोजगार जारी रहेगा। दरअसल स्कूल के खाली पड़े कई कमरों में एयर कंडीशन लगे थे। इसका उपयोग करते हुए मशरूम का उत्पादन हो रहा है। स्कूल के इन क्लासरूम का उपयोग अभी मशरूम के प्लांटिंग, प्रोसेसिंग, पैकेजिंग के लिए किए जा रहे हैं। यहां आधुनिक तरीके से पूरे साफ -सफाई और नियमों का पालन कर मशरुम का उत्पादन हो रहा है।

शिक्षकों की जगह मजदूरों ने ली
यहां अब शिक्षक की जगह मजदूर ने ले ली है और बच्चों के कोलाहल की जगह मशरूम पैकिग मशीन की आवाज गूंजने लगी है। क्लास रूम में अब बेंच डेस्क नहीं बल्कि बांस का स्ट्रक्चर तैयार हो गया है। बीते पांच दिनों से मशरूम के शौकीन लोगों की रसोई से स्थानीय मशरूम की महक आने लगी है। हालांकि उत्पादन की मात्रा फिलहाल सीमित है, लेकिन अगले माह से प्रत्येक लॉट में 1000 किलो मशरूम उत्पादन का लक्ष्य है और इसके लिए तैयारी भी लगभग पूर्ण हो चुकी है। तीन प्रजाति के मशरूम उत्पादन के लिए 700 बैग तैयार है और प्रथम चरण की प्रक्रिया से गुजर रहा है।

डेढ़ लाख की हो चुकी कमाई
मशरूम की उपज प्रति बैग एक से डेढ़ किलो तक हो जाती है। एक बैग तैयार करने में अधिकतम 100 रुपये की लागत आती है। जमुई में मशरूम से 250 रुपये प्रति किलो प्राप्त हो रहे हैं। डेढ़ सौ ग्राम के पैकेट में सब्जी विके्रताओं को वे 40 रुपये की दर से दी जा रही है। उजले और गुलाबी रंग में आयस्टर प्रजाति का मशरूम तैयार हो रहा है। बटन मशरूम तैयार होने में अभी 15 से 20 दिनों का वक्त लगेगा। आगे मिल्की मशरूम उत्पादन की तैयारी के लिहाज से बीज मंगा लिया गया है। स्कूल के क्लासरूम में होने वाले मशरूम से युवा निदेशक अभी तक डेढ़ लाख की कमाई कर चुका है, दावा है कि आने वाले दिनों में लगभग 500 मशरूम का पैकेट तैयार हो रहा है जिससे होने वाले आमदनी से आर्थिक परेशानी को दूर कर लेगा।

 



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