Published On: Sat, Aug 28th, 2021

महायोगी गुरु गोरखनाथ कौन हैं जानिए?


– अचानक लोगों में महायोगी गुरु गोरखनाथ के बारे में जानने की जिज्ञासा शुरू हो गई।

गोरखनाथ. गोरखपुर में आज महायोगी गोरखनाथ विश्वविद्यालय का राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद लोकार्पण करेंगे। अचानक लोगों में महायोगी गुरु गोरखनाथ के बारे में जानने की जिज्ञासा शुरू हो गई।

नाथ पंथ के अगुवा बाबा गोरखनाथ :- आदिकाल में नाथपंथियों की हठयोग साधना शुरू हुई। इस पंथ को चलाने वाले मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) और गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) माने जाते हैं। इस पंथ के साधक लोगों को योगी, अवधूत, सिद्ध, औघड़ कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि सिद्धमत और नाथमत एक ही हैं।

13वीं सदी में गोरखनाथ का जन्म :- नाथ परम्परा बहुत प्राचीन है, महायोगी गोरखनाथ के वक्त नाथ परम्परा लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुई। गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ थे। दोनों को चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। महायोगी गोरखनाथ के जन्म पर मतभेद हैं। पर प्रसिद्ध साहित्याकार राहुल सांकृत्यायन इनका जन्मकाल 845 ई. की 13वीं सदी में मानते हैं।

गोरखनाथ को गोरक्षनाथ नाम से भी पुकारा जाता है :- महायोगी गुरु गोरखनाथ को गोरक्षनाथ भी कहा जाता है। गोरखपुर शहर को इन्हीे महायोगी का नाम मिला है। गोरखनाथ, नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखनाथ से पहले अनेक सम्प्रदाय थे, जिनका नाथ सम्प्रदाय में विलय हो गया।

गोरखनाथ थे हठयोगी :- गोरखनाथ ने हठयोग का उपदेश दिया। गोरखनाथ शरीर और मन के साथ नए-नए प्रयोग करते थे। जनश्रुति अनुसार उन्होंने कई कठ‍िन (आड़े-त‍िरछे) आसनों का आविष्कार किया था। उनके अजूबे आसनों को देख लोग अ‍चम्भित हो जाते थे। बाबा गोरखनाथ ऐसे कार्यों को देख कर एक कहावत प्रचलन में आ गई, जब भी कोई उल्टे-सीधे कार्य करता है तो कहा जाता है कि ‘यह क्या गोरखधंधा लगा रखा है।’

शून्य समाधि परम लक्ष्य :- महायोगी गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।

गोरखनाथ मंदिर :- गोरखनाथ (गोरखनाथ मठ) नाथ परंपरा में नाथ मठ समूह का एक मंदिर है। पूर्वी उत्तर प्रदेश, तराई क्षेत्र और नेपाल में ये मंदिर काफी लोकप्रिय है। नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे ‘सिले’ कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को ‘सींगी सेली’ कहते हैं।

प्रसिद्ध शिष्य :- गुरु गोरखनाथ जी के प्रतिनिधि के रूप में संत को महंत के नाम से पुकारा जाता है। इस मंदिर के प्रथम महंत श्री वरद्नाथ जी महाराज हैं, जो गुरु गोरखनाथ जी के शिष्य थे। तत्पश्चात परमेश्वर नाथ एवं गोरखनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार करने वालों में प्रमुख बुद्ध नाथ जी (1708-1723 ई), बाबा रामचंद्र नाथ जी, महंत पियार नाथ जी, बाबा बालक नाथ जी, योगी मनसा नाथ जी, संतोष नाथ जी महाराज, मेहर नाथ जी महाराज, दिलावर नाथ जी, बाबा सुन्दर नाथ जी, सिद्ध पुरुष योगिराज गंभीर नाथ जी, बाबा ब्रह्म नाथ जी महाराज, ब्रह्मलीन महंत श्री दिग्विजय नाथ जी महाराज, महंत श्री अवैद्यनाथ जी और इस वक्त योगी आदित्यनाथ इस पर सुशोभित हैं।

गोरखपुर को आयुष विश्वविद्यालय व गोरखनाथ विश्वविद्यालय की सौगात देंगे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद





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