Published On: Sat, Aug 21st, 2021

Jagat Seth: कौन थे फतेह चंद, जिनसे कर्ज लेकर अंग्रेजों ने भारत में जमाये थे पैर, बाद में मिला जगत सठे का टाइटल


Jagat Seth Biography: भारत आज भले ही विकसित देशों की तरह साधन संपन्‍न न हो, लेकिन इस देश ने ऐसा सुनहरा दौर भी देखा है जब यह पूरी तरह साधन संपन्‍न था और इस देश को सोने की चिडिय़ा कहा जाता था। यही कारण था कि कई सदियों तक इस देश को विदेशी अक्रांताओं द्वारा लूटा गया। हालांकि इसके बाद भी हमारे इतिहास में कुछ ऐसे नाम भी दर्ज हैं जो राजा-महाराज न होने के बाद भी अपने धन-दौलत के बल पर राज करते थे। ऐसे ही एक व्‍यक्ति थे मुर्शिदाबाद के जगत सेठ, जिन्‍हें सेठ फतेहचंद के नाम से भी जाना जाता था। आज के समय में भले ही बंगाल का मुर्शिदाबाद शहर गुमनामी में जी रहा हो, लेकिन उस समय यह हर किसी के लिए व्यापारिक केंद्र हुआ करता था, हर तरफ इसी स्थान के चर्चे हुआ करते थे, शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हुआ हो उस समय जो इस स्थान और जगत सेठ के बारे में न जानता हो। कहा जाता है कि एक समय इनके पास इतना पैसा था, जिनता इंग्‍लैंड के सभी बैंकों के पास नहीं था।

कौन थे जगत सेठ
जगत सेठ एक टाइटल है जो फ़तेह चंद को मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह ने 1723 में दिया था। जिसके बाद इस पूरे परिवार को जगत सेठ के नाम से जाने जाने लगा। इस घराने का संस्‍थापक सेठ मानिक चंद को माना जाता है। बताया जाता है कि जगत सेठ महताब राय के पूर्वज मारवाड़ के रहने वाले थे। 1495 ई. में गहलोत राजपूतों में से गिरधर सिंह गहलोत ने जैन धर्म स्वीकार कर लिया था। इस परिवार के हीरानन्द साहू 1652 ई. में मारवाड़ छोड़ पटना में आ बसे थे। पटना उन दिनों व्यापार का एक बड़ा केन्द्र हुआ करता था। यहां हीरानन्द साहू ने शोरा का कारोबार शुरू किया, उन दिनों योरोपियन शोरा के सबसे बड़े ख़रीदार हुआ करते थे। शोरा व्यापार के साथ-साथ साहू ने ब्याज पर कर्ज देने के काम को भी बढ़ाया था और जल्दी ही उनकी गिनती धनवान साहूकारों में होने लगी थी। हीरानन्द साहू के सात बेटे थे, जो व्यापार करने के लिए इधर-उधर बिखर गये। उनके एक बेटे माणिक चन्द ढाका आ गये जो उस जमाने में बंगाल की राजधानी हुआ करती थी।

दरअसल माणिक चन्द ही थे जिन्होंने बंगाल के जगत सेठ परिवार की बुनियाद रखी थी। मुर्शिद क़ुली ख़ां बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सूबेदार और माणिक चंद एक दूसरे के गहरे दोस्त थे। माणिक चंद न सिर्फ नवाब मुर्शिद क़ुली ख़ां के ख़जांची थे बल्कि सूबे का लगान भी उनके पास जमा होता था। दोनों ने मिल कर बंगाल की नयी राजधानी मुर्शिदाबाद बसायी थी और औरंगज़ेब को एक करोड़ तीस लाख की जगह पर दो करोड़ लगान भेजा था। 1715 में मुग़ल सम्राट फ़र्रुख़सियर ने माणिक चंद को सेठ की उपाधि दी थी। इसके लिए एक बड़े से पन्ने पर जगत सेठ खुदवा कर सील बनवाई गयी थी, जो दूसरे दुर्लभ उपहारों के साथ शाही दरबार में फतेह चंद को पेश की गयी। इसके बाद ये परिवार जगत सेठ के नाम से जाना जाने लगा। माणिकचंद के बाद परिवार की बागड़ोर फ़तेह चंद के हाथ में आयी जिनके समय में ये परिवार बुलंदियों पर पहुंचा।

ढाका, पटना, दिल्ली सहित बंगाल और उत्तरी भारत के महत्वपूर्ण शहरों में इस घराने की शाखाएं थीं। इसका मुख्यालय मुर्शिदाबाद में था, इसका ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ लोन, लोन की अदायगी, सर्राफ़ा की ख़रीद-बिक्री आदि का लेनदेन था। इस घराने की तुलना बैंक ऑफ़ इंग्लैंड से की गई है। आंकड़ों के मुताबिक, 1718 से 1757 तक ईस्ट इंडिया कंपनी जगत सेठ की फर्म से सालाना 4 लाख कर्ज लेती थी। डच और फ्रेंच कंपनियों के साथ भारत के कई राजा-महाराज को भी यह फर्म कर्ज देती थी।
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करीब 1000 बिलियन पाउंड थी संपत्ति
जगत सेठ घराने की संपत्‍ती की अगर बात करें तो कहा जाता था कि यह परिवार चाहे तो सोने और चांदी की दीवार बनाकर गंगा की धारा को रोक सकता है। इस घराने ने सबसे अधिक संपत्ती फतेहचंद के दौर में अर्जित की। उस समय उनकी संपत्‍ती क़रीब 10,000,000 पाउंड की थी, जो आज के हिसाब से करीब 1000 बिलियन पाउंड के करीब होगी। ब्रिटिश सरकार के दस्तावेजों के अनुसार उनके पास इंग्लैंड के सभी बैंकों की तुलना में अधिक पैसा था, कुछ रिपोर्टो का ये भी अनुमान है कि 1720 के दशक में ब्रिटिश अर्थव्यवस्था जगत सेठों की संपत्ति से छोटी थी।

इस संपत्ती की रखवाली के लिए यह परिवार 2000 से 3000 सैनिकों की अपनी सेना रखता था। आप इनकी दौलत को ऐसे भी आंक सकते हैं कि अविभाजित बंगाल की पूरी ज़मीन में लगभग आधा हिस्सा उनका था, यानी अभी के असम, बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल को मिला लें तो उनमें से आधे का स्वामित्व उनके पास था।
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पलट दिया था बंगाल का शासन
जगत सेठ फ़तेहचंद्र के बाद उसका पौत्र महताबचंद्र दूसरा जगत सेठ बना। बंगाल के सूबेदार के साथ बहुत अच्छे संबंध बना कर रखने वाले जगत सेठ और बंगाल के सूबेदार सरफ़राज़ ख़ां में 1739-40 में कुछ खटक गया था। वजह यह थी कि सरफ़राज़ ख़ां अय्याश था, औरतें उसकी कमज़ोरी थीं, किसी ने उसे यह बता दिया था कि जगत सेठ फतेह चंद की बहू अप्सराओं जैसी सुन्दर है। सत्ता और शराब के नशे में चूर सरफ़राज़ ख़ां ने यह आदेश दे दिया कि वह जगत सेठ फतेह चंद की बहू को देखना चाहता है, यह आदेश जगत सेठ के मुंह पर तमाचा था। इस अपमान का बदला लेने के लिए जगत सेठ ने बिहार के नायब सूबेदार से सम्पर्क साधा।

अलीवर्दी ख़ां को मौके की तलाश थी, वह बंगाल का सूबेदार बनना चाहता था, जगत सेठ की मदद ने उसकी योजनाओं को आगे बढ़ा दिया। 10 अप्रैल 1740 को अलीवर्दी खान ने सरफ़राज़ ख़ां पर चढ़ाई कर दी। इस युद्ध में टिकारी के महाराजा सुंदर सिंह अलीवर्दी खान का साथ दे रहे थे। दोनों के सेना का राजमहल के पास गिरिया के मैदान में आमना-सामना हुआ था। जहां इस लड़ाई के दौरान सरफ़राज़ ख़ां के ही किसी फौजी ने उसे गोली मार दी थी।

अब कहां है परिवार
जगत सेठ ने प्लासी की लड़ाई से पहले और बाद में काफी रुपये-पैसों से अंग्रेजों को कर्ज़ के रूप में बड़ी मदद की। बाद में अंग्रेज़ों नें ईस्ट इंडिया कंपनी के ऊपर जगत सेठ का कोई कर्ज़ होने से इंकार कर दिया। अंग्रेजों के द्वारा धोखा देने पर जगत सेठ पगला गया। इसके कुछ समय बाद ही जगत सेठ घराने की अवनति शुरू हो गई, फिर भी 1912 ई. तक इस घराने के किसी न किसी व्यक्ति को जगत सेठ की उपाधि और थोड़ी-बहुत पेंशन अंग्रेज़ों की तरफ़ से मिलती रही। 1912 ई. के बाद यह पेंशन भी बंद हो गई। इस तरह एक सेठ का नाम लुप्त हो गया, अब इस परिवार के बारे में कोई जानकारी नहीं है।



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